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	<title>अजन्तपुँल्लिङ्गप्रकरणम् - आवृत्ती इतिहास</title>
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	<updated>2026-09-02T04:04:02Z</updated>
	<subtitle>विकिवरील या पानाच्या आवृत्त्यांचा इतिहास</subtitle>
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		<title>ImportMaster: robot: Import pages using विशेष:आयात</title>
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		<updated>2022-05-01T16:02:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;robot: Import pages using &lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4&quot; title=&quot;विशेष:आयात&quot;&gt;विशेष:आयात&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नवीन पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;= &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;अजन्तपुॅंल्लिङ्गप्रकरणम्&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;ref&amp;gt;{{स्रोत पुस्तक|title=वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी|first=भट्टोजि दीक्षित|publisher=चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन|year=२०१६|isbn=|location=वाराणसी|pages=११००}}&amp;lt;/ref&amp;gt; =&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विषय - ====&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अजन्तपुॅंल्लिङ्ग प्रकरणाचे संज्ञासूत्र. [&amp;quot;अर्थवदधातुरप्रत्यय प्रातिपादिकम्&amp;quot; या सूत्रापासून ते &amp;quot;यचि भम्&amp;quot; पर्यन्त]&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रस्तावना - ====&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;quot;संज्ञाच परिभाषाच विधिर्नियम एव च।&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;आतिदेशोsधिकारश्चषड्विधं सूत्रलक्षणं&amp;quot;।।&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;lt;ref&amp;gt;व्याकरणातील सूत्र&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्याकरणाचे सूत्र मुख्य सहा प्रकारचे आहे.त्यातील संज्ञासूत्राचा अर्थ म्हणजे जे सूत्र संज्ञाचे विधान करते अश्या सूत्रानां &amp;#039;संज्ञासूत्र&amp;#039;, &amp;#039;संज्ञाविधाक&amp;#039; असे म्हणतात. उदा. हलन्त्यम्,अदर्शनंलोपः। लोक व्यवहारात संज्ञा महत्त्वाची आहे.म्हणून संज्ञा केली जाते.संज्ञा तीन प्रकाराचीअसते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== संज्ञा सूत्रांचे प्रकार ====&lt;br /&gt;
१) अन्वर्थ संज्ञा (सर्वनाम,अव्यय,सम्प्रदान)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२)कुत्रिम संज्ञा (टि,घ,घु,भ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३)पम्परागत संज्ञा (प्रातिपादिक ,आर्धधातुक.....)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== १) प्रातिपदिकसंज्ञासूत्र ====&lt;br /&gt;
प्रातिपदिकसंज्ञासूत्र दोन प्रकारचे आहेत.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१) अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२) कृत्तद्धितसमासाश्च।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्। १।२।४५।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|२|४५&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ती-: ======&lt;br /&gt;
धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तंच वर्जयित्वाsर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्यात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ-: ======&lt;br /&gt;
धातु प्रत्यय आणि प्रत्ययान्ताला सोडून अर्थवान् शब्द स्वरुपाला प्रातिपदिक संज्ञा प्राप्त होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== स्पष्टिकरण-: ======&lt;br /&gt;
ज्या शब्दाची प्रातिपादिकसंज्ञा होईल. ज्याचा सामान्य कोणता पण अर्थ असेल. तो शब्द धातु, प्रत्यय आणि प्रत्ययान्त या रूपाने ओळखला नाही गेला पाहिजे. याप्रकारे धातुभिन्न ,प्रत्ययभिन्न, प्रत्ययान्तभिन्न असलेले शब्दाची प्रातिपदिक संज्ञा होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== कृत्तद्धितसमासाश्च १।२।४६।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|२|४६&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ती-: ======&lt;br /&gt;
कृत्तद्धितान्तो समासाश्च प्रातिपदिकसंज्ञा: स्यु: ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ-: ======&lt;br /&gt;
अर्थवान् कृदन्त,तद्धितान्त,आणि समास यांची पूर्ववत् प्रातिपदिकसंज्ञा होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== स्पष्टिकरण-: ======&lt;br /&gt;
हे सूत्र कृदन्त, तद्धितान्त आणि समासाची प्रातिपदिक संज्ञा करते. या सूत्रानुसार ज्याची प्रातिपदिक संज्ञा होते. तो शब्द यौगिक अर्थात् व्युत्पन्नच असतो. याप्रकारे येथे व्युत्पन्न पक्षाच्या राम शब्दाची अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्। या सूत्राने प्रातिपदिक संज्ञा होते .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  या सूत्राच्या उदाहरणात कृदन्त - कर्ता भर्ता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
      तद्धितान्त- औपगव: दशरथिः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
       समास - राजपुरूषः भूतपूर्व:।     &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
   प्रातिपादिकसंज्ञा यासाठी अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्।आणि कृत्तद्धितसमासाश्च।हे दोनच सूत्र आहेत.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रातिपादिकसंज्ञा यासाठी महत्त्वाची आहे की ,जो समोर प्रत्यय सांगितला आहे. किंवा सांगितले जात आहे, जसे-:सु,औ,जस्...सुप् इ. होण्यासाठी,कारण प्रातिपदिकसंज्ञा नाही झाली तर सुप् इ.प्रत्यय पण होणार नाही.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== २) बहुवचनसंज्ञासूत्र ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== सुपः ।१।४।१०३।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|४|१०३&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ति -: ======&lt;br /&gt;
सुपस्त्रीणी त्रिणि वचनान्येकशः एकवचनद्विवचनबहुवचनसंज्ञानि स्यु:।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ-: ======&lt;br /&gt;
सुप्चे तीन तीन वचनक्रमशः एकवचन, द्विवचन आणि बहुवचन संज्ञक होतात.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याप्रकारे &amp;#039;सु&amp;#039;ची एकवचनसंज्ञा, &amp;#039;औ&amp;#039;ची द्विवचनसंज्ञा, &amp;#039;जस्&amp;#039;ची बहुवचन संज्ञा होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ३) सम्बुद्धिसंज्ञासूत्र ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== एकवचनं सम्बुद्धि: २।३।४९।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी २|३|४९&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ति-: ======&lt;br /&gt;
सम्बोधने प्रथमाया एकवचन सम्बुद्धिसंज्ञं स्यात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ-: ======&lt;br /&gt;
सम्बोधनात प्रथमाची एकवचन सम्बुद्धि संज्ञा होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== स्पष्टिकरण-: ======&lt;br /&gt;
&amp;#039;स्वाभिमुखीकृत्य ज्ञापनम् आह्वानं वा सम्बोधनम्&amp;#039; या अनुसार दुसऱ्याला आपल्याकड़े आकृष्ट करणे आणि तदर्थ ज्याचे नाव किंवा कोणत्या शब्दविशेषाने इंगित करणे याला सम्बोधन असे म्हणतात. जसे -: हे राम! हे कुष्ण! अयें वत्से!इत्यादि. याप्रकारे सम्बोधनामध्ये प्रथमाविभक्ति आहे. त्यांच्या एकवचनाचि सम्बुद्धिसंज्ञा होते. अर्थात् &amp;#039;सु&amp;#039; की सम्बुद्धिसंज्ञा होते.सम्बोधनात प्रथमा विभक्तिचे विधान &amp;#039;सम्बोधनेच &amp;#039;सूत्र करतो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सर्वादीनि सर्वनामानि १।१।२७।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|१|२७&amp;lt;/ref&amp;gt; ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ति-: ======&lt;br /&gt;
सर्वादीनि शब्दस्वरुपाणि सर्वनामसंज्ञानि स्युः।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ -: ======&lt;br /&gt;
सर्वादि गणामध्ये पठित असलेले शब्दस्वरूपाला सर्वनाम संज्ञा होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== स्पष्टिकरण -: ======&lt;br /&gt;
बहुव्रीही समासासारखे सर्वादीनि मध्ये सुद्धा अन्यपदार्थ प्रधानआहे. अन्यपदार्थ असल्यामुळे येथे आकांशा निर्माण होते की,सवादि गणामध्ये स्वयं सर्व शब्द येतो की नाही? सर्व शब्द ज्याच्या पाहिलेअसेल,याप्रकारे अन्य विश्व इ. (सर्व शब्द सोडून) सर्वादि म्हटले जातात. किंवा सर्व शब्द सोबत विश्व इ.शब्द सोबत विश्व शब्द सर्वनाम म्हटले जाते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वनामप्रयुक्त कार्य जस्,ङे,ङसि ,आम्, ङि प्रत्ययालाच होतात.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदा. सर्वस्मै.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ५) पदसंज्ञा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== स्वादिष्वसर्वनामस्थाने १।४।१७।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|४|१७&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ति -: ======&lt;br /&gt;
कप्प्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु परतःपूर्वं पदसंज्ञं स्यात्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ -: ======&lt;br /&gt;
सर्वनाम स्थान संज्ञक प्रत्ययाला सोडून् &amp;#039;सु&amp;#039; पासून &amp;#039;कप्&amp;#039; प्रत्यया पर्यंतचे प्रत्ययांच्या नंतर असल्यावर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्वचा शब्दस्वरूप पदसंज्ञक होतो.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== स्पष्टिकरण-: ======&lt;br /&gt;
सर्वनाम स्थानभिन्न &amp;#039;सु&amp;#039; इत्यादी.प्रत्ययाने समुदायाचि पदसंज्ञा होते.ज्याप्रमाणे&amp;#039;सुप्तिङ्न्त पदम्&amp;#039; या सूत्राने &amp;#039;सुबन्त&amp;#039; आणि &amp;#039;तिङन्त&amp;#039; यांची पदसंज्ञा होते.परंतु &amp;#039;सुप्तिङ्न्तं पदम्&amp;#039; हे सूत्र सुप् सोबत शब्दाची पदसंज्ञा करते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ६) भसंज्ञा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===== याचि भम् १।४।१८।&amp;lt;ref&amp;gt;अष्टाध्यायी१|४|१८&amp;lt;/ref&amp;gt; =====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== वृत्ति -: ======&lt;br /&gt;
यकारादिष्वजादिषुच कप्प्रत्ययावाधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु परतः पूर्वं भसंज्ञं स्यात् ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====== अर्थ -: ======&lt;br /&gt;
सर्वनाम स्थानसंज्ञक प्रत्यय पासून भिन्न यकारादि किंवाअजादि प्रत्यय जो स्वादि ते कप् प्रत्यय पर्यंत येतात,त्यांच्या नंतर असेल तर विद्यमान प्रकृति भसंज्ञक होते.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदा. शस्, टा, ङे, ङसि, ङस्, ओस्, आम्, ङि, ओस् कप्प्रत्ययावाधिक शेष अजादि स्वादि.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;#039; स्वादिष्वसर्वनामस्थाने &amp;#039; सूत्राचे अपवाद &amp;#039;यचि भम्&amp;#039; सूत्र आहे.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[वर्ग:संस्कृत व्याकरण]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ImportMaster</name></author>
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