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	<title>शिव तांडव स्तोत्र - आवृत्ती इतिहास</title>
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	<subtitle>विकिवरील या पानाच्या आवृत्त्यांचा इतिहास</subtitle>
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		<title>ImportMaster: robot: Import pages using विशेष:आयात</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;robot: Import pages using &lt;a href=&quot;/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4&quot; title=&quot;विशेष:आयात&quot;&gt;विशेष:आयात&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नवीन पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;शिव तांडव स्तोत्र&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ([[संस्कृत]]: शिवताण्डवस्तोत्र, रोमनीकृत: shiva-tāṇḍava-stotra) हे [[शिव|शिवाच्या]] सामर्थ्याचे आणि सौंदर्याचे वर्णन करणारे [[संस्कृत]] [[स्तोत्र]]  आहे. याचे श्रेय पारंपारिकपणे [[श्रीलंका|लंकेचा]] राजा [[रावण]] याला दिले जाते, जो शिवाचा महान भक्त मानला जातो.&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot;&amp;gt;Vālmīki; Menon, Ramesh (2004-05-26). &amp;#039;&amp;#039;The Ramayana: A Modern Retelling of the Great Indian Epic&amp;#039;&amp;#039;. Macmillan. ISBN &amp;lt;bdi&amp;gt;978-0-86547-695-0&amp;lt;/bdi&amp;gt;.&amp;lt;/ref&amp;gt; असे मानले जाते की रावणाने शिवाची स्तुती करण्यासाठी आणि [[मोक्ष|मोक्षाची]] याचना करण्यासाठी हे स्तोत्र रावणाने रचले होते.&amp;lt;ref&amp;gt;Ayres, Elizabeth (2005). &amp;#039;&amp;#039;Know the Way: A Journey in Poetry and Prose&amp;#039;&amp;#039;. Infinity Publishing. p. 18. ISBN &amp;lt;bdi&amp;gt;9780741428257&amp;lt;/bdi&amp;gt;.&amp;lt;/ref&amp;gt;[[चित्र:Shivatandavstrotram.jpg|अल्ट=शिवतांडवस्तोत्रम् |इवलेसे|शिवतांडवस्तोत्रम् ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कथा==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravana_shaking_the_Kailas.jpg|इवलेसे|[[कैलास]] हादरवणारा रावण: [[वेरूळ]] लेण्यांमधील एक शिल्प. ता. ०४ डिसेंबर २००४]]&lt;br /&gt;
पौराणिक कथांमध्ये अशी मान्यता आहे की, [[रावण|रावणा]]ने संपूर्ण [[कैलास पर्वत|कैलास]] पर्वत उचलला आणि [[श्रीलंका|लंकेला]] घेऊन चालला होता, तेव्हा त्याला त्याच्या शक्तीवर अहंकार झाला. [[शिव|शंकरांना]] त्याचा हा अहंकार नष्ट करायचा होता, म्हणून त्यांनी अंगठ्याने दाब दिला व पर्वत आहे त्या जागी पुन्हा स्थापित झाला. यामुळे रावणाचा हात पर्वताखाली दाबला गेला आणि त्याचा मनातील अहंकार गळून मनात शिवभक्तीचा अंतर्नाद घुमला &amp;quot;शंकर शंकर&amp;quot;- अर्थात क्षमा मागून स्तुती करू लागला. हीच स्तुती म्हणजे शिव तांडव स्तोत्र. ह्या शिव तांडव स्तोत्राने भगवान [[शिव|शंकर]] एवढे प्रसन्न झाले की त्यांनी रावणाला सकळ समृद्धी असणारी [[श्रीलंका|लंकाच]] नव्हे तर ज्ञान, विज्ञान तसेच अमरत्व वरदानरूपात दिले.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असे मानले जाते की, मात्र स्तोत्र ऐकल्याने व्यक्तीला धनधान्य, समृद्धी व पुत्रप्राप्ती होते.&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ravanan_-_King_of_Lanka.jpg|इवलेसे|शिवाचे निवासस्थान असलेल्या [[कैलास]] पर्वतावर [[रावण]] शिव तांडव स्तोत्र गातो.]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==काव्यशैली==&lt;br /&gt;
ह्या स्तोत्राची भाषा अनुपम आणि जटील आहे. हे स्तोत्र पंचचामर छंदात बद्ध आहे. ह्या स्तोत्रातील [[अनुप्रास]] तसेच [[समास|समासांचा]] प्रभावी वापर स्तोत्राला वेगळी काव्यशैली प्राप्त करून देतो.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तोत्रात प्रत्येक ओळीत 16 अक्षरे आहेत, ज्यामध्ये लघू (लघु अक्षर) आणि गुरू (दीर्घ अक्षरे) वर्ण आहेत; काव्यमापक हे व्याख्येनुसार आयंबिक अष्टमापक आहे. एकूण १६ क्वाट्रेन आहेत.&amp;lt;ref&amp;gt;{{संकेतस्थळ स्रोत|url=https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0|title=शिवताण्डवस्तोत्र - विकिस्रोतः|website=sa.wikisource.org|language=sa|access-date=2022-04-11}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
या स्तोत्राच्या नवव्या आणि दहाव्या दोन्ही चतुर्भुजांचा शेवट शिवाचा संहारक, अगदी मृत्यूचा नाश करणारा म्हणूनही होतो. हिंदू भक्ती कवितेच्या या उदाहरणात अनुपलब्धता आणि ओनोमॅटोपोईया सौंदर्याच्या लहरी निर्माण करतात.&amp;lt;ref&amp;gt;Ramachander, P. R. &amp;quot;Shiva Thandava Stotram&amp;quot;. &amp;#039;&amp;#039;saivism.net&amp;#039;&amp;#039;. Retrieved 25 July 2018.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवितेच्या शेवटच्या चतुर्थांशात, संपूर्ण पृथ्वीवर धावपळ करून थकल्यानंतर, रावण विचारतो, &amp;quot;मी कधी आनंदी होईन?&amp;quot; त्याच्या प्रार्थना आणि तपस्वी ध्यानाच्या तीव्रतेमुळे, ज्याचे हे स्तोत्र एक उदाहरण आहे, रावणाला शिवाकडून शक्ती आणि चंद्रहास नावाची दिव्य तलवार मिळाली.&amp;lt;ref&amp;gt;Cakrabartī, Bishṇupada (24 July 2008). &amp;#039;&amp;#039;The Penguin Companion to the Ramayana&amp;#039;&amp;#039;. Penguin. p. 91. ISBN &amp;lt;bdi&amp;gt;978-0143100461&amp;lt;/bdi&amp;gt;. Retrieved 24 July 2018.&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=&amp;quot;:0&amp;quot; /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्तोत्र==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align: center;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
॥ सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम् ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।&lt;br /&gt;
: डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।&lt;br /&gt;
: धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।&lt;br /&gt;
: कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।&lt;br /&gt;
: मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।&lt;br /&gt;
: भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।&lt;br /&gt;
: सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।&lt;br /&gt;
: धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।&lt;br /&gt;
: निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।&lt;br /&gt;
: स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।&lt;br /&gt;
: स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।&lt;br /&gt;
: धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।&lt;br /&gt;
: तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।&lt;br /&gt;
: विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।&lt;br /&gt;
: तनोतुनो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।&lt;br /&gt;
: विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: इमं ही नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।&lt;br /&gt;
: हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं ही देहिनांं सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।&lt;br /&gt;
: तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मराठी भाषांतर==&lt;br /&gt;
जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजंग-तुंग-मालिकाम्  डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्या शंकरांच्या सघन वनरुपी जटांमधून प्रवाहित होणाऱ्या गंगेच्या धारा ज्यांचा कंठाला प्रक्षालित करतात, ज्यांचा गळ्याला लांब व मोठ्या सर्पमाळा गुंडाळलेल्या आहेत, तसेच जे शंकर डमरूचा डम-डम असा नाद करत प्रचंड तांडव करत आहेत, ते शंकर आमचे कल्याण करो. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जटा-कटा-हसं-भ्रमभ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी- -विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि . धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्या शंकरांच्या जटांत अतिवेगाने विलासपूर्वक भ्रमण करणाऱ्या या देवी गंगेच्या धारा ज्यांच्या मस्तकावरून प्रवाहित होत आहेत, ज्यांच्या मस्तकावर अग्नीच्या प्रचंड ज्वाळा धगधगत आहेत, त्या लघु चंद्राने विभूषित शिवासाठी माझा अनुराग प्रतिक्षण वाढत राहो.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धरा-धरेन्द्र-नंदिनीविलास-बन्धु-बन्धुर स्फुर-द्दिगन्त-सन्ततिप्रमोद-मान-मानसे . कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे गिरीकन्या पार्वतीच्या विलासमय रमणीय कटाक्षात  अत्यानंदित मनाने राहतात, ज्यांच्या मस्तकी संपूर्ण सृष्टी व प्राणिमात्र निवास करतात, तसेच ज्यांच्या कृपादृष्टीने भक्तांचे सर्व कष्ट दूर होतात, अशा दिगंबर शंकरांच्या आराधनेत माझे मन सदा उल्हासित राहो.            &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जटा-भुजंग-पिंगल-स्फुरत्फणा-मणिप्रभा कदम्ब-कुंकुम-द्रवप्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे  मदान् ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि ॥४॥  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मी त्या शंकरांच्या भक्तीत नेहमी आनंदी राहो जे सर्व प्राणिमात्रांचे रक्षणकर्ते आहेत, ज्यांच्या जटांत असणाऱ्या सापांच्या फण्यातील मण्यांचा प्रकाश पिवळ्या रंगाच्या प्रभा समूहरुपकेसराच्या कांतीने दिशांना प्रकाशित करत आहे  आणि जे गजचर्माने विभूषित आहे.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहस्रलोचनप्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सरांघ्रि-पीठभूः  भुजंगराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटकः श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्या शंकरांच्या चरणांवर सर्व देवतागण पुष्प-सुमन अर्पण करतात, ज्यांच्या जटेवर लाल सर्प विराजमान आहे, ते चंद्रशेखर आंम्हाला चिरकाल संपदा देवता.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनंजय-स्फुलिंगभा- निपीत-पंच-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्  सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्या शंकरांनी इंद्रादि देवतांचा गर्व दहन केला, कामदेवाला आपल्या विशाल मस्तकाच्या अग्नि ज्वाळेने भस्म केले, तसेच जे सर्व देवांना पूज्य आहेत, आणि जे चंद्र व गंगे द्वारे सुशोभित आहेत ते  महादेव मला सिद्धी प्रदान करोत.      &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल द्धनंज-याहुतीकृत-प्रचण्डपंच-सायके  धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक -प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्यांच्या मस्तकीच्या धगधगणाऱ्या प्रचंड ज्वाळेने कामदेवाला भस्म केले होते तसेच जे शंकर देवी पार्वतीच्या स्तनाच्या अग्रभागावर चित्रकारी करण्यात( येथे पार्वती म्हणजे प्रकृती, चित्रकारी म्हणजे सृजन) चतुर आहेत, त्या शंकरांंवर माझी प्रीती अटळ होवो.         &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत् कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः  निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्यांचा कंठ नवीन मेघांनी परिपूर्ण असलेल्या अमावस्येच्या रात्री समान काळा आहे, जे की गज-चर्म, गंगा व लघु चंद्राने शोभायमान आहेत, तसेच जे जगाचे ओझे धारण करणारे आहेत, ते शंकर आम्हाला सर्व प्रकारच्या संपदा प्रदान करोत. &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रफुल्ल-नीलपंकज-प्रपंच-कालिमप्रभा- -वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् . स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्यांचे कंठ व खांदे पूर्ण उमललेल्या नीलकमळाच्या पसरलेल्या सुंदर श्यामप्रभेने विभूषित आहेत, जे कामदेव आणि त्रिपुरासुराचे विनाशक, संसारातून दुःख संपवणारे , दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर व अंधकासुराचे संहारक आहेत तसेच जे लय तत्त्वाचे स्वामी आहेत, मी त्या शंकरांना भजतो. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अखर्वसर्व-मंग-लाकला-कदंबमंजरी रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम् . स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे कल्याणमय, अविनाशी, सर्व कलांचा रसास्वाद घेणारे आहेत, जे कामदेवाला भस्म करणारे आहेत, गजासुर अंधकासुर त्रिपुरासुराचे संहारक, दक्षयज्ञविध्वंसक तसेच प्रत्यक्ष यमराजासाठीसुद्धा यमस्वरुप आहेत, मी त्या शंकरांची आराधना करतो. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संदर्भ ==&lt;br /&gt;
[[वर्ग:महिला संपादनेथॉन २०२० लेख]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:हिंदू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:स्तोत्रे]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:शिव]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ImportMaster</name></author>
	</entry>
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