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	<title>हरी नारायण आपटे - आवृत्ती इतिहास</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नवीन पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{माहितीचौकट साहित्यिक&lt;br /&gt;
 | नाव = &lt;br /&gt;
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 | संकेतस्थळ_दुवा = &lt;br /&gt;
 | तळटिपा = &lt;br /&gt;
 }}&lt;br /&gt;
{{गल्लत|नारायण हरी आपटे}} &lt;br /&gt;
&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;हरी नारायण आपटे&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, अर्थात &amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;ह.ना. आपटे&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;, ([[मार्च ८]], [[इ.स. १८६४]] - [[मार्च ३]], [[इ.स. १९१९]]) हे [[मराठी भाषा|मराठी]] [[लेखक]], [[कादंबरी]]कार, [[नाटक]]कार, [[कवी]] व व्याख्याते होते. ते [[ज्ञानप्रकाश]] या मासिकाचे काही काळ [[संपादक]], आनंदाश्रम या प्रकाशनसंस्थेचे व्यवस्थापक, आणि करमणूक या मासिकाचे संस्थापक-संपादक होते. [[अकोला]] येथे भरलेल्या [[महाराष्ट्र]] [[साहित्य]] संमेलनाचे ते संमेलनाध्यक्ष होते. त्यांनी अनेक पुस्तकांना प्रस्तावना लिहिल्या आहेत. आठ [[स्त्री]]रत्ने या सदराखाली ह.ना.आपटे यांनी भास्कराचार्यांची [[लीलावती]], [[राणी दुर्गावती]] इत्यादी स्त्रियांची बोधप्रद माहिती प्रकाशित केली होती. [[केशवसुत|केशवसुतांची]] [[कविता]] आणि [[गोविंद बल्लाळ देवल]] यांचे [[संगीत शारदा|शारदा]] हे नाटक हरिभाऊ आपट्यांनीच प्रकाशात आणले.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Ha Na Apte.jpg|इवलेसे|हरी नारायण आपटे]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== प्रकाशित साहित्य ==&lt;br /&gt;
आपटे अर्वाचीन [[मराठी]] कादंबरीचे [[जनक]] मानले जातात. त्यांच्या लिखाणावर [[महादेव गोविंद रानडे]], [[गोपाळ कृष्ण गोखले]] प्रभृतींचा प्रभाव होता. १२ सामाजिक आणि ११ ऐतिहासिक अशा एकूण २३ कादंबऱ्या लिहिणाऱ्या ह.ना. आपटयांची &amp;#039;पण लक्षात कोण घेतो?&amp;#039; ही कादंबरी मराठी साहित्यात मानदंड समजली जाते.  सतत २५-३० वर्षे अशाप्रकारचे मराठी साहित्य निर्माण झालेल्या त्या ह.ना.आपट्यांच्या कालखंडाला हरीभाऊ [[युग]] म्हणतात, आणि हरीभाऊ आपट्यांना युगप्रवर्तक. हरिभाऊंनी नाटकेसुद्धा लिहिली आहेत. दोन नाटके स्वतंत्र आहेत, त्यांतले ’सती पिंगळा’ हे नाटक त्यांच्या मृत्यूनंतर प्रकाशित झाले.  उरलेली तीन नाटके व तीन प्रहसने रूपांतरित आहेत. &amp;#039;&amp;#039;धूर्तविलसत&amp;#039;&amp;#039;, &amp;#039;&amp;#039;मारून मुटकून [[वैद्य]]बुवा&amp;#039;&amp;#039; व &amp;#039;&amp;#039;जबरीचा [[विवाह]]&amp;#039;&amp;#039; ही फ्रेन्च नाटककार [[मोलियर]]च्या प्रहसनांची रूपांतरे आहेत  तर, &amp;#039;&amp;#039;जयध्वज&amp;#039;&amp;#039; (मूळ व्हिक्टर ह्यूगोचे &amp;#039;हेर्नानी&amp;#039;), &amp;#039;&amp;#039;श्रुतकीर्तचरित&amp;#039;&amp;#039; (काँग्रेव्हचे  ’द मोर्निंग ब्राईड’) व &amp;#039;&amp;#039;सुमतिविजय&amp;#039;&amp;#039; ([[शेक्सपियर|शेक्सपियरचे]] ’मेझर फॉर मेझर’) ही [[रूपांतरित नाटके]] आहेत. त्यांनी [[मुंबई]] मराठी [[ग्रंथ]] संग्रहालयाच्या तेराव्या वार्षिक सभेपुढे दिलेल्या व्याख्यानांची पुस्तिका ’विदग्धवाङ्‌मय’ या नावाखाली प्रकाशित झाली होती. ’नाट्यकथार्णव’ यामासिकासाठी त्यांनी मेडोज टेलर या इंग्रजी लेखकाच्या दोन कादंबऱ्यांची  ’तारा’ व ’पांडुरंग हरी’ ही मराठी भाषांतरे केली होती. &amp;#039;&amp;#039;बिचारा&amp;#039;&amp;#039; या टोपणनावाने ह.ना. आपट्यांनी २९ मार्च, इ.स. १८८१ च्या [[केसरी (वृत्तपत्र)|केसरीच्या]] अंकात कालिदास व भवभूती यांच्या संबंधांत लिहिलेल्या पत्रांतून त्यांचा व्यासंग व समीक्षा दृष्टी दिसून येते. [[निबंध]]कार [[चिपळूण]]कर यांच्या निधनानंतर हरीभाऊ आपट्यांनी शिष्यजनविलाप ही ८८ श्लोकांची विलापिका लिहिली होती. ती विद्वज्जनांनी वाखाणली होती. सुरुवातीच्या काळात साहित्याला एक वेगळी उंची प्राप्त करून देण्यामध्ये हरी नारायण आपटे यांनी महत्त्वपूर्ण योगदान दिले सामाजिक आणि ऐतिहासिक स्वरूपाच्या कादंबऱ्या त्यांनी लिहिल्या त्यांच्या कादंबऱ्यांतून समाजाचं यथार्थ चित्रण केलं गेलं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;wikitable sortable&amp;quot;  &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| नाव&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| साहित्यप्रकार&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;30%&amp;quot;| प्रकाशन&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| प्रकाशन वर्ष (इ.स.)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आजच || सामाजिक कादंबरी (अपूर्ण) || रम्यकथा प्रकाशन|| इ.स. १९०४ - इ.स. १९०६&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| उषःकाल||ऐतिहासिक कादंबरी||  || इ.स. १८९५ - इ.स. १८९७&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| घटकाभर करमणूक|| कथासंग्रह|| || इ.स. १९१७&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कर्मयोग|| सामाजिक कादंबरी(अपूर्ण) || रम्यकथा प्रकाशन	|| इ.स. १९१३ - इ.स. १९१७ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| कालकूट ||ऐतिहासिक कादंबरी(अपूर्ण) ||  || इ.स. १९०९ - इ.स. १९११&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| केवळ स्वराज्यासाठी|| ऐतिहासिक कादंबरी||  || इ.स. १८९८ - इ.स. १८९९ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गड आला पण सिंह गेला || ऐतिहासिक कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १९०३ - इ.स. १९०४&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गणपतराव || सामाजिक कादंबरी(अपूर्ण) ||आधी मासिक’मनोरंजन’, नंतर रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८८६ - इ.स. १८९२&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|गीतांजली||टागोरांचे चरित्र व त्यांच्या गीतांजलीचा गद्य अनुवाद || || इ.स. १९१७&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चंद्रगुप्त|| ऐतिहासिक माहितीपर ||  || इ.स. १९०२ - इ.स. १९०५&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चंद्रगुप्त व चाणक्य|| ऐतिहासिक कादंबरी  ||  || इ.स. १९०२ - इ.स. १९०५&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| चाणाक्षपणाचा कळस || सामाजिक कादंबरी || आधी मनोरंजन मासिक, नंतर रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८८६ - इ.स. १८९२ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जग हें असें आहे... || सामाजिक कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८९७ - इ.स. १८९९ &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| जबरीचा विवाह|| प्रहसन(रूपांतरित)||मूळ लेखक - [[मोलियर]] || इ.स. १९१०&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| जयध्वज || नाटक(रूपांतरित) ||मूळ - व्हिक्टर ह्यूगोचे &amp;#039;हेर्नानी&amp;#039; || &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तारा||सामाजिक कादंबरी(अनुवादित)||  || &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| धूर्त विलसत|| प्रहसन (रूपांतरित)||मूळ लेखक - [[मोलियर]] || इ.स. १९१० &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पण लक्षात कोण घेतो? || सामाजिक कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८९० - इ.स. १८९२&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पांडुरंग हरी|| सामाजिक कादंबरी (अनुवादित)||  || &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| भयंकर दिव्य || कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १९०१ - इ.स. १९०३&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| भासकवीच्या नाटककथा || अनुवादित कथा  || || इ.स. १९१७&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मधली स्थिति(आजकालच्या गोष्टी)|| सामाजिक कादंबरी ||आधी मासिक ’पुणे वैभव’, नंतर रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८८५ - इ.स. १८८८&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| माध्यान्ह||  सामाजिक कादंबरी||  || इ.स. १९०६ - इ.स. १९०८&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मायेचा बाजार || सामाजिक कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १९१० - इ.स. १९१२&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
|मारून मुटकून वैद्यबुवा||प्रहसन (रूपांतरित)||मूळ लेखक - [[मोलियर]] || इ.स. १९१० &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मी ||  सामाजिक कादंबरी|| रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८९३ - इ.स. १८९५&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| म्हैसूरचा वाघ ||अनुवादात्मक ऐतिहासिक कादंबरी(अपूर्ण) ||  || इ.स. १८९० - इ.स. १८९१ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यशवंतराव खरे || सामाजिक कादंबरी|| रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १८९२ - इ.स. १८९५&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूपनगरची राजकन्या || ऐतिहासिक कादंबरी || रम्यकथा प्रकाशन || इ.स. १९०० - इ.स. १९०२&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| वज्राघात || ऐतिहासिक कादंबरी||  || इ.स. १९१३ - इ.स. १९१५ &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| विदग्धवाङ्‌मय ||व्याख्यानपुस्तिका|| || इ.स. १९११&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शिष्यजनविलाप|| श्लोकमय विलापिका||साप्ताहिक केसरी  ||मार्च, इ.स. १८८२ &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| श्रुतकीर्तचरित|| नाटक(रूपांतरित)  || || &lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| संत सखू||नाटक|| || इ.स. १९११&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| सती पिंगळा|| नाटक|| || इ.स. १९२१&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| सुमतिविजय || नाटक(रूपांतरित) ||मूळ [[विल्यम शेक्सपियर]] लिखित मेझर फाॅर मेझर || &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| स्फुट गोष्टी -भाग १ ते ६ ||कथासंग्रह||  || इ.स. १९१७&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| सूर्यग्रहण|| ऐतिहासिक कादंबरी(अपूर्ण) ||  || इ.स. १९०८ - इ.स. १९०९ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सूर्योदय || ऐतिहासिक कादंबरी ||  || इ.स. १९०५ - इ.स. १९०६ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरिभाऊंचीं पत्रें &amp;lt;ref&amp;gt;हरी नारायण आपटे यांनीं श्री काशीबाई व गोविंद वासुदेव कानिटकर यांस लिहिलेलीं पत्रें ; दोन शब्द, काशीबाई कानिटकर ; प्रस्तावना वाग्भट नारायण देशपांडे&amp;lt;/ref&amp;gt; || पत्रसंग्रह || ऐक्यसंपादन मंडळ || &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== संदर्भ ==&lt;br /&gt;
{{संदर्भयादी}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ह.ना. आपटे यांच्यासंबंधीची पुस्तके==&lt;br /&gt;
* आलोचना मासिकाचा हरि नारायण आपटे विशेषांक (इ.स. १९६३) &lt;br /&gt;
* सहा साहित्यकार (हरिभाऊ आणि इतर, [[सु. रा. चुनेकर]])  &lt;br /&gt;
* हरि नारायण आपटे (चरित्र, लेखक [[रा.भि. जोशी]])&lt;br /&gt;
* हरि नारायण आपटे, चरित्र व वाङ्‍मयविवेचन (इ.स. १९३१) : लेखिका वेणूताई पानसे&lt;br /&gt;
* हरि नारायण आपटे यांचे संक्षिप्त चरित्र (इ.स. १९२२) : लेखक [[बापुजी मार्तंड आंबेकर]]&lt;br /&gt;
* ह.ना. आपटे (कांहीं आठवणी आणि मनोरंजक प्रसंग) ([[बापुजी मार्तंड आंबेकर]])&lt;br /&gt;
* ह.ना. आपटे निवडक वाङ्‌मय : साहित्य अकादमी प्रकाशन (इ.स. १९८९) : संपादक [[विद्याधर पुंडलिक]] &lt;br /&gt;
* हरिभाऊ, काळ आणि कर्तृत्व (इ.स. १९७२) : लेखक वि.बा.आंबेकर.&lt;br /&gt;
* हरिभाऊ आपटे यांची आत्मचरित्रात्मक कादंबरी -&amp;#039;मी&amp;#039; -डॉ. रेखा वडिखाये &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरिभाऊ आपटे यांची  &amp;#039;मी&amp;#039; ही कादंबरी त्यांच्या जीवनावर आधारित असल्याने तिच्यातून  तत्कालीन, सामाजिक, राजकीय, सांस्कृतिक, आर्थिक परिस्थितीचे दर्शन घडते. कादंबरी नायकप्रधान वाटत असली तरी ती स्त्रीजीवनकेंद्री आहे.स्त्रियांच्या दुःखांना वाचा फोडणे हाच या कादंबरीचा मूळ हेतू आहे. पुरुषप्रधान संस्कृतीच्या अनुषंगाने निर्माण झालेली पुरुषजातीची आणि समाजाची स्त्रीकडे बघण्याची मानसिकता बदलण्याची गरज त्यांनी या कादंबरीत वर्तवली आहे. हरिभाऊंचे वडील कुटुंब सोडून गेल्यामुळे आईच्या वाट्याला आलेले दुःख, बहीण गंगी तिचा साठीच्या आतबाहेर असलेल्या पुरुषाशी झालेला जरठबाला विवाह, घराघरांत असलेल्या गंगीसारख्या स्त्रियां, त्यांची अवस्था बदलण्यासाठी शिक्षण हाच एकमेव मार्ग आहे या जाणिवेतून हरिभाऊंनी त्याकाळी स्त्री शिक्षणाचा जोरकसपणे  पुरस्कार केला. हरिभाऊ आपटे यांनी मृत्युपूर्वी लिहून ठेवलेल्या या कादंबरीत समाविष्ट केलेल्या पत्रात समाजसुधारणेविषयीची त्यांची तळमळ प्रकर्षाने जाणवते. ते म्हणतात,&amp;quot;एकोणविसाव्या शतकानंतर आता आपला शत्रू म्हणजे आपले अज्ञान. आज हजारो वर्षे जगाचे पाऊल पुढे पडत आहे ते ज्ञानाच्या जोरावर. ज्ञानाचे स्थान एकेकाळी आपला आर्य देश होता. पुढे इजिप्त झाला, पुढे रोम झाला. पुढे फ्रान्स,जर्मनी,इंग्लंड, अमेरिका इत्यादी देश होत गेले आहेत. आता जपानमध्ये ते आले आहे. कालचक्राप्रमाणे ज्ञानाने आपले स्थान बदलले. ज्या स्थानांतून त्याचा लोप झाला त्या स्थानांचे वैभवही लयास गेले.म्हणून अज्ञानरूपी शत्रूला जिंकण्यासाठी ज्ञानाचा प्रसार करणे हेच मोठे अकुंठित गतिशात्र आहे.&amp;quot;( &amp;#039; मी &amp;#039; -पृ.क्र. ४५३ ,४५४) समाजातील केवढा मोठा मानवसमूह पुरुषप्रधान संस्कृतीने अज्ञानाच्या अंधारात ठेवल्याने त्याच्याजवळ असलेल्या विविध क्षमतांचा समाजविकासासाठी आणि देशविकासासाठी वापर होऊ शकत नाही, याचे दुःख हरिभाऊ वरील परिच्छेदात अतिशय कळकळीने व्यक्त करताना दिसतात. त्यांच्या या विचारांची आजच्या समाजालाही नितांत गरज आहे.स् त्रीशिक्षण  आणि स्त्री -पुरुष समानतेचा विचार हा या कादंबरीचा गाभा आहे. यायोगेच कुटुंबाचा, समाजाचा, पर्यायाने देशाचा विकास घडून येणार आहे.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधार ग्रंथ -       &amp;#039; मी &amp;#039; -कादंबरी - हरिभाऊ आपटे , सर्व्हिडिया प्रकाशन, पुणे,१९६५ ,पाचवी आवृत्ती  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{विस्तार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{मराठी साहित्यिक}}&lt;br /&gt;
{{DEFAULTSORT:आपटे,हरी नारायण}}&lt;br /&gt;
[[वर्ग:मराठी लेखक]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:अखिल भारतीय मराठी साहित्य संमेलनांचे अध्यक्ष]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:इ.स. १८६४ मधील जन्म]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:इ.स. १९१९ मधील मृत्यू]]&lt;br /&gt;
[[वर्ग:कैसर-ए-हिंद पुरस्कार विजेते]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>ImportMaster</name></author>
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